किराए का मकान तो पराया होता है
फिर क्यों हर बार ये अपना सा लगता है
जब भी सोचा कि इस बार दिल ना लगाउंगी
अबकी बार प्यार ना जताउंगी
तभी दीवार पर लटकी जिंदगी की तस्वीर ने पुकारा
जब भी चाहा कि इस बार घर ना चमकाउंगी
अबकी बार पड़ोस से आंखे चुराउंगी
तभी बालकनी से झांकती धूप ने सहलाया
जब सोचा कि अब कमरे में चुपके से आंसू न बहाउंगी
अबकी बार किसी कि बात को दिल से न लगाउंगी
तभी बाहर से झांकती तुलसी ने मां कि तरह पुचकारा
जब सोचा कि किराए के घर में मंदिर ना बैठाउंगी
अबकी बार नींद से रिश्ता ना बनाउंगी
तभी बैडरुम में लेटे सपने ने जगाया
जब भी दफ्तर से घर लौटी तो
खिड़की पर लगे पौधे और रसोई में रखे चुल्हे ने बुलाया
केतली में रखी चाय और बालकनी से आती ढलते सूरज की चमक ने समझाया
किराए का घर तो पराया होता है
पर हर घर को अपना बनाने का तरीका होता है
फिर क्यों हर बार ये अपना सा लगता है
जब भी सोचा कि इस बार दिल ना लगाउंगी
अबकी बार प्यार ना जताउंगी
तभी दीवार पर लटकी जिंदगी की तस्वीर ने पुकारा
जब भी चाहा कि इस बार घर ना चमकाउंगी
अबकी बार पड़ोस से आंखे चुराउंगी
तभी बालकनी से झांकती धूप ने सहलाया
जब सोचा कि अब कमरे में चुपके से आंसू न बहाउंगी
अबकी बार किसी कि बात को दिल से न लगाउंगी
तभी बाहर से झांकती तुलसी ने मां कि तरह पुचकारा
जब सोचा कि किराए के घर में मंदिर ना बैठाउंगी
अबकी बार नींद से रिश्ता ना बनाउंगी
तभी बैडरुम में लेटे सपने ने जगाया
जब भी दफ्तर से घर लौटी तो
खिड़की पर लगे पौधे और रसोई में रखे चुल्हे ने बुलाया
केतली में रखी चाय और बालकनी से आती ढलते सूरज की चमक ने समझाया
किराए का घर तो पराया होता है
पर हर घर को अपना बनाने का तरीका होता है