Wednesday, September 28, 2016

कोलाहल पर कोलाहल गूंज रहा है


जंग तो आखिर जंग है, इधर हो या चाहे उधऱ
ढेर है लाशों का, सबकी आंखें नम है

कोलाहल पर कोलाहल गूंज रहा है
लोहा लेने फिर से चल पड़ा वीर है

मत मना जश्न किसी की लाश पर
जो मरा है वो भी एक इंसान है
जिससे जुड़े किसी के रिश्तों के अरमान है

धरती की खातिर मिटे किसी अपनों के अरमान है
किसी की राखी, किसी का सिंदुर फिर आज पंहुचा शमशान है

जहां खुदा के रंग बिखरे थे, वहां लहू का सागर बह रहा है
जिस गोद में कभी बचपन खिला था, वहां आज नीरस धड़ पडा है

किसी के सपने, किसी का सिंदूर अधूरा सा रह जाता है
जहां कभी लाली बिखरी थी, वहां सफेद रंग ही रह पाता है

जिस बेटे को कंधों पर बैठा कर मेला दिखाया है
उस सपुत ने पिता को अग्नि देना ही नसीब में पाया है ।।।।।



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