Saturday, December 17, 2016

बचपन का ज़माना



एक बचपन का ज़माना था 
जिसमें खुशियों का खज़ाना था
चाहत चांद को थी पाने की 
पर मन तो तितली का दीवाना था
ना सुबह और शाम का होश 
और ना रात का ठिकाना था
थक कर आना स्कूल से 
पर शाम को खेलने भी जाना था
कभी पापा-मम्मी से रूठ कर बैठना
और कभी पल भर में मान जाना था
बारिश में कागज़ की नाव थी
और हर मौसम सुहाना था
भिंडी-तोरी-करेला प्लेट में देखकर नाक सिकुड़ी 
पर बाहर की चाट-पकौड़ी दस्तों संग चट कर जाना था
प्यार करने का तरीका तो वही पुराने जैसा है
पर आज लगता है इंसान का विश्वास छोटा हो गया है 

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